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पुण्य सलिला क्षिप्रा की कहानी – जानें! कैसे जन्मी क्षिप्रा ?

यदि ये नदी क्षिप्रा ना होती तो शायद सिंहस्थ कुम्भ और उज्जैनी नगरी भी ना होती ….क्या है कहानी क्षिप्रा की , कैसे हुआ जन्म और क्या क्या देखा क्षिप्रा ने , आईये जाने ….

 

मालवा के पठार में जो अनेक उत्तर वाहिनी नदियाँ हैं उनमें यद्यपि चम्बल, पार्वती तथा बेतवा सबमें बड़ी हैं परंतु सांस्कृतिक द्रष्टया अवंति प्रदेश की क्षिप्रा ही सर्वोपरि मानी जाती है। अवंति महात्म्य में कहा है-

नास्ति बस्त न ही पृष्ठे क्षिप्राया सदृशी नदी

यस्यातीरे क्षणामुक्ति किंचिरास्ते बिलेन वै

इस महात्म्य प्राप्ति का एक लंबा इतिहास है जो उसके तटवर्ती प्रदेश की पुरा वस्तुओं के आधार पर स्थिर है। यह नदी महू नगर से दक्षिण पूर्व में विंध्याचल पहाड़ियों से निकलती है तथा देवास जिले से होती हुई उज्जैन-महिदपुर होती हुई रतलाम जिले में चम्बल नदी से सिपावरा के निकट मिलती है। इस 120 मील की लंबी यात्रा में यद्यपि आज निर्मित बाँधों के कारण तथा विंध्य श्रेणी के वन-विहीन होने के कारण इसका वह शिप्र प्रवाह आज वैदिक सरस्वती के समान अंत:सलिला हो गया है और भूतकाल की यह अक्षुण्ण धारा मात्र आज अपने घुमावों पर या डोह स्थानों पर सरस वान हो गयी है पर यह कथा तो मालवा की अधिकांश नदियों से संबद्ध है तथा कल तक जहाँ डग-डग रोटी पग-पग नीर यह कहावत चरितार्थ होती थी, वहीं आज पशु मीलों तक इसके मूल प्रवाह मार्ग पर जल की खोज में लपलपाती धूप में करूणरव के साथ घूमते रहते हैं और पार्वती नदी के विषय में कही गयी कालिदासीय उक्ति इस नदी के लिये अब चरितार्थ हो गयी है।

यह नदी कैसे प्रारंभ हुई इसके विषय में एक महत्वपूर्ण पौराणिक आख्यान है। एक बार भगवान महाकाल क्षुधातुर हो विष्णु के पास पहुँचे। उन्होंने एक दिशा में तर्जनी निर्देश किया। शंकर ने देखा कि विंध्य क्षेत्र में जिस पर्वत श्रेणी से वह बँधा था, वहाँ एक छिद्र कर दिया और उससे वह बँधा जल सोपानाश्म (डेक्कन ट्रॅप) की क्षरित लाल मिट्टी से प्रवाहित हुआ अत: रक्त वर्ण था। उन्होंने उसे अपने कमण्डल में धारण किया। अत: उसे क्षिप्रा कहते हैं। दूसरी कथा में शिव ने विष्णु तर्जनी को ही छेद दिया। अत: जो रक्त प्रवाह हुआ वही क्षिप्रा रूप में बदल गया। इसका लाक्षणिक अर्थ तो यही है कि लेटराइटिक मिट्टी के कारण उसका प्रवाह रक्त वर्ण हुआ।

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क्षिप्रा का आसमंत प्रदेश अपनी उपजाऊ काली मिट्टी के लिये, उत्तम जलवायु के लिये विगत 3500 वर्ष से चावल व गेहूँ उत्पादन के लिये प्रसिद्ध रहा है। क्षिप्रा के तट पर ही प्राचीन खगोल विज्ञान के ज्ञाता खगोल गणित का अभ्यास करते रहे और मिर्जा राजा जयसिंह ने क्षिप्रा तट पर ही अपनी वैधशाला बनवाई, जहाँ आज भी ज्योतिष वैध लिये जाते हैं, पंचांग बनाये जाते हैं। क्षिप्रा के पावन तट पर ही शक्ति उपासना की केन्द्र हरसिद्धि देवी का मंदिर है। यहीं कापालकों के केन्द्र भैरवनाथ का मंदिर है। जैनों के श्रेष्ठ तीर्थंकर महावीर ने औखलेश्वर के श्मशान में तपस्या कर उसे अतिशय तीर्थ बनाया था। यहाँ न केवल हिन्दुओं के ही तीर्थ रहे अपितु सूफी संत की भी यहाँ समाधि है, मुसलमान फकीरों में मौलाना रूसी भी आये थे। मुगल काल में क्षिप्रा निकटवर्ती गुहा केन्द्र में महात्मा जदरूप जी से साक्षात्कार करने स्वयं बादशाह जहाँगीर मिलने आये थे। Kshipra1

क्षिप्रा के दोनों तटों पर धर्मवरुदा, रणजीत हनुमान, सोढंग, कानिपुरा विजासिनी टेकरी पर बौद्ध स्तूपों के अवशेष, बौद्ध मत का प्रबल प्रादुर्भाव बताते हैं। तो दूसरी ओर बौद्धानुयायी चंडाशोक द्वारा भैरवगढ़ क्षेत्र में बनाये गये नरकागार का मृत्तिका प्रकार उसके विपरीत आचरण का साक्षी है। विक्रम के दरबार में नवरत्नों से लेकर पं. सूर्यनारायण व्यास तक यहाँ विद्वत् परम्परा रही। ‘रसभाव विशेष दीक्षा गुरु’ विक्रम के दरबार में कवि गोष्ठी होती रहती थी। यह परम्परा परमार राजा भोज के समय तक चलने वाली ज्ञानाभिज्ञ सभा ने कवि वेणु को पदवी सेवित की थी उसी परम्परा में परमार हरीशचन्द्र और गुप्त राजा चंद्रगुप्त को बुद्धि का साक्षात्कार देना पड़ा।

सांस्कृतिक परम्परा का केन्द्र इसके स्वनाम धन्य कवि कुलगुरु कालिदास के कारण जैसा प्रसिद्ध था, वैसे ही मातंग के कारण भी विश्वविख्यात था, जिसने बौद्ध धर्म की पताका का ध्वजोत्तोलन चीन की राजधानी पीकिंग से पहुँचकर किया था। क्षिप्रावत, क्षिप्रा जल और महाकाल वन यह सांस्कृतिक जागरण का केन्द्र रहा है और यहाँ भी मालवी कला जब भित्ति चित्रों से मुखर हो उठती है, सावन माण्डवों से मण्डित हो उठता है और जब कार्तिक पूर्णिमा व एकादशी के मध्य विद्वतसभा, संस्कृत काव्य-गायन, देश-विदेश के नाट्य कलाकारों का भावगम्य अभिनय, नृत्यांगनाओं के भाव मधुर तालबद्ध अंग विक्षेप, चित्रकारों की तूलिकाओं से मण्डित कालिदास काव्य-कथा का चित्रण, सब कुछ क्षिप्रा तट पर एक सांस्कृतिक जागरण करता है जो भारत ही नहीं विश्व में अनूठा है। मंदिरों की अट्टालिकाओं से गूँजते भक्तिगान सहस्रों ग्रामवासियों के कंठ से निनादित जय महाकाल जय काली के उदघोष भारत की सांस्कृतिक सुषमा को शाश्वत रूप में जीवित रखे हुए हैं।

औद्योगिक धुम्र वलय, लोहयानों के अखण्ड चलित चक्रों की ध्वनि और विद्वजनों के साथ यहाँ के पक्षी भी किसी गंभीर चिंतना का कलरव निनादित करते हैं। वे क्षिप्रा की शांत तरल तरंगों के समान भारतीय संस्कृति का आलोड़न कर विश्व चेतना का शाश्वत संदेश देते रहते हैं। यही है इस पुण्य-सलिला क्षिप्रा की मालव भूमि को देन, जो भूत, वर्तमान और भविष्य को आलोकित करती रही है और रहेगी। क्षिप्रा मइया की जय ध्वनि से मालवजनों की श्रद्धा, मातृवत् प्रेम और आत्मीय भाव को सदा-सदा विश्व कल्याणार्थ बहुजन हिताय, बहुजन दीप शिखा के सम्मान आत्म-बलिदान से जीवन देती रहेगी।

इस नगर में बहने वाली पुण्य सलिला क्षिप्रा का वर्णन यजुर्वेद में ‘शिप्रे अवे: पय:” के रूप में आया है। यह नदी इस नगर के तीन ओर से बहती है, इसलिये इसका ‘करधनी” नामकरण भी किया गया है। इस नगरी में आकर इसके घाटों पर स्नान करने से व्यक्ति को मुक्ति प्राप्त हो जाती है तथा यह स्थल स्वयमेव तीर्थ बन जाते हैं। कहा जाता है कि सौ योजन (चार सौ कोस) दूर से भी यदि कोई क्षिप्रा नदी का स्मरण मात्र करता है तब उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं तथा वह स्वर्ग-लोक को प्राप्त कर लेता है। मालवा की मोक्षदायिनी गंगा अर्थात् क्षिप्रा अपने उद्गम स्थल से कुल 120 मील (195 किलोमीटर) बहकर चम्बल (चर्मण्यवती) में मिलती है। नगर में इसके तटों पर धार्मिक, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक साधनाएँ कर अनेक साधकों ने सिद्धि प्राप्त की हैं। इसीलिये इसके तटों पर बसे मंदिर, आश्रम एवं उपासना-स्थल सांसारिकता से मुक्ति दिलाकर बैकुण्ठवासी बनाने में सहायक हैं। इस भवसागर से पार उतारने में इस नगरी को मोक्षदायिनी माना गया है। स्कन्द पुराण के अवंतिखण्ड में क्षिप्रा के तट स्थित घाट ही तीर्थ-स्थल माने गये हैं, जिनकी महिमा का गान किया गया है। उत्तरवाहिनी क्षिप्रा का स्वरूप ओखलेश्वर से मंगलेश्वर तक पूर्ववाहिनी है। इसी अवंतिखण्ड में इस नगरी के जिन तीर्थों का उल्लेख किया गया है, वह शंखोद्वार, अजागन्ध, चक्र, अनरक, जटाभृंग, इन्द, गोप, चिविटा, सौभाग्यक, घृत, शंखावर्त, सुधोदक, दुर्धर्ष, गोपीन्द्र, पुष्पकरण्ड, लम्पेश्वर, कामोदक, प्रयाग, भद्रजटदेव, कोटि, स्वर्णक्षुक, सोम, वीरेश्वर, नाग, नृसिंह इत्यादि हैं।

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इस नगरी में अनेक सरोवर, कुएँ, बावड़ियाँ, तालाब, कुण्ड और क्षिप्रा नदी है। यहाँ के सप्त सागरों में रत्नाकर, सोला या पुरुषोत्तम, विष्णु, गोवर्धन, क्षीर, पुष्कर और रुद्रसागर आदि रहे हैं। यह नगरी जल-सम्पदा से हर युग में हरी-भरी रही है। यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य का अनेक कवियों ने अपने साहित्य में उल्लेख किया है।

क्षिप्रा के तट स्थित कई दर्शनीय एवं पर्यटन-स्थल हैं, जिनमें त्रिवेणी स्थित नवग्रह एवं शनि मंदिर, नृसिंहघाट, रामघाट, मंगलनाथ, सिद्धनाथ, कालभैरव, भर्तृहरि की गुफा, कालियादेह महल, सूर्य मंदिर आदि हैं। यहाँ वर्षभर लाखों श्रद्धालुओं का आना-जाना बना रहता है।

उज्जयिनी की मोक्षदायिनी क्षिप्रा के तटों पर विश्व-प्रसिद्ध सिंहस्थ महापर्व के दौरान एक ‘लघु भारत” उपस्थित हो जाता है। यही कारण है कि क्षिप्रा किनारे के घाट अन्य पवित्र नगरियों के घाटों से कमतर नहीं हैं। देश-विदेश के कई श्रद्धालु और आस्तिकजन द्वारा क्षिप्रा किनारे के इन्हीं घाटों पर अपने पितृ पुरुषों की आत्मा की सद्गति के लिये श्राद्ध और तर्पण आदि कर उज्जयिनी की महिमा को विस्तारित किया जाता है।

लेख : डॉ. घि.श्री. वाकणकर | म.प्र. जनसंपर्क से साभार

 

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